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कार्तिक स्वामी की ओर
Published 10 Aug 2026
बहुत दिनों से मन में था कि कार्तिक स्वामी जाऊँ। कारण पूछिए तो कोई विशेष कारण नहीं था। न कोई मन्नत थी, न किसी ने कहा था कि वहाँ जाना ही चाहिए। बस कभी किसी तस्वीर में उस पहाड़ी पर ख
बहुत दिनों से मन में था कि कार्तिक स्वामी जाऊँ।
कारण पूछिए तो कोई विशेष कारण नहीं था। न कोई मन्नत थी, न किसी ने कहा था कि वहाँ जाना ही चाहिए। बस कभी किसी तस्वीर में उस पहाड़ी पर खड़े छोटे-से मंदिर को देखा था। पीछे बर्फ से ढकी चोटियाँ थीं और सामने जैसे पूरा आकाश उतर आया हो। उसी दिन से उस जगह का नाम मन के किसी कोने में पड़ा रहा।
एक सुबह मैंने कार निकाली और चल पड़ा।
पहाड़ों की यात्राओं में मुझे सबसे अधिक आनंद इसी बात का आता है कि मंज़िल धीरे-धीरे आपके सामने खुलती है। मैदानों की सड़क की तरह यहाँ ऐसा नहीं कि सौ किलोमीटर चलिए और वही दृश्य सामने पड़ा रहे। पहाड़ हर मोड़ पर अपना चेहरा बदल लेते हैं।
कहीं सड़क देवदार और चीड़ के बीच से निकलती, कहीं अचानक पेड़ हट जाते और नीचे इतनी गहरी घाटी दिखाई देती कि अनायास पैर ब्रेक पर हल्का-सा दब जाता।
एक-दो जगह मैंने कार रोक भी दी।
कोई खास viewpoint नहीं था। न कोई बोर्ड लगा था, न कोई दुकान। बस सड़क के किनारे थोड़ी-सी जगह मिली और सामने पहाड़ अच्छे लगे, तो रुक गया।
इंजन बंद होते ही एक अजीब-सी खामोशी उतर आई।
अभी कुछ क्षण पहले तक कार के भीतर इंजन की आवाज़ थी, टायरों की घरघराहट थी। अब केवल हवा थी। दूर कहीं किसी पक्षी की आवाज़ आती और फिर सब शांत।
मैं कार के सहारे खड़ा होकर नीचे घाटी को देखता रहा।
ऐसे समय आदमी को पता नहीं क्यों लगता है कि वह बहुत दिनों से कहीं पहुँचने की जल्दी में था, जबकि वास्तव में उसे मालूम ही नहीं था कि जाना कहाँ है।
फिर चल पड़ा।
पहाड़ी रास्तों पर गाड़ी चलाना मुझे हमेशा अच्छा लगता है, लेकिन यहाँ रास्ते में एक अलग ही अपनापन था। कभी कोई गाँव आता। दो-चार घर, बाहर बैठे लोग, सड़क के किनारे खड़ी कोई पुरानी बोलेरो, किसी छत पर सूखते कपड़े। कहीं बच्चे सड़क के पास खेलते दिखाई देते।
हम शहरों में रहते हुए अक्सर पहाड़ों को केवल दृश्य समझ लेते हैं।
पर वहाँ भी लोगों की सुबह होती है, कोई दूध लेने निकलता है, कोई दुकान खोलता है, कोई खेत की तरफ जा रहा होता है। हमारे लिए जो सड़क यात्रा है, वही किसी के लिए रोज़ का रास्ता है।
यही सब देखते हुए मैं कनकचौरी पहुँचा, जहाँ से आगे कार का साथ छूट जाना था।
कार खड़ी की तो पहली बार लगा कि अब असली परीक्षा शुरू होगी।
सामने पैदल रास्ता था।
दूर से देखने में पहाड़ी रास्ते हमेशा सरल लगते हैं। आदमी सोचता है—बस इतना-सा तो चलना है।
मैंने भी यही सोचा।
कुछ ही देर बाद पहाड़ ने मेरी इस गलतफहमी का उत्तर दे दिया।
चढ़ाई शुरू हुई तो पहले कदम बड़े उत्साह से उठे। शरीर में ताकत थी और मन मंदिर देखने को बेचैन। लेकिन पहाड़ आदमी के उत्साह से प्रभावित नहीं होते। उनका रास्ता जितना ऊपर जाना होता है, उतना ही ऊपर जाता है।
थोड़ी देर बाद साँस तेज होने लगी।
मैंने कदम धीमे कर दिए।
आगे कुछ लोग जा रहे थे। कोई परिवार था, शायद। उनमें से एक बुजुर्ग आदमी बिना किसी जल्दी के धीरे-धीरे चढ़ रहा था। मैं उसे पीछे छोड़कर आगे निकला। मन में थोड़ी प्रसन्नता भी हुई कि अभी तो मैं अच्छी गति से चल रहा हूँ।
दस-पंद्रह मिनट बाद मैं एक जगह रुककर साँस ले रहा था।
वही बुजुर्ग कुछ देर बाद मेरे पास से गुजरे।
उन्होंने मेरी तरफ देखा, हल्का-सा मुस्कुराए और चलते रहे।
मैं भी मुस्कुरा दिया।
पहाड़ बड़ी आसानी से आदमी का अहंकार ठीक कर देते हैं।
रास्ते में कहीं-कहीं पेड़ों के बीच से दूर की चोटियाँ दिखाई देतीं। तब थकान जैसे कुछ देर के लिए गायब हो जाती।
मैं रुकता, पीछे मुड़कर देखता।
जिस रास्ते से कार चलाकर आया था, उसका अब कोई पता नहीं था। नीचे केवल पहाड़ों की परतें थीं—एक के पीछे दूसरी, फिर तीसरी, और उसके पीछे धुंध में खोती हुई कोई चौथी।
हवा भी अब पहले से ठंडी हो गई थी।
रास्ते में चलते हुए धीरे-धीरे बातचीत की आवाज़ें कम होने लगीं। जो लोग साथ-साथ चढ़ रहे थे, वे भी अब अपनी साँस बचा रहे थे।
ऐसी चढ़ाई में मनुष्य बड़ा सच्चा हो जाता है।
शहर में हम बहुत बातें करते हैं। यहाँ दो वाक्य बोलने से पहले आदमी सोचता है कि इतनी साँस खर्च करना आवश्यक भी है या नहीं।
मैं चलता रहा।
कभी मन कहता—अभी कितना बाकी है?
फिर किसी उतरते हुए यात्री से पूछता, “भाई, मंदिर कितनी दूर है?”
पहाड़ों में इस प्रश्न का उत्तर बड़ा विचित्र होता है।
कोई कहता, “बस थोड़ा-सा।”
थोड़ा-सा कितने का होता है, यह शायद केवल पहाड़ी लोग जानते हैं।
वह थोड़ा-सा कई मोड़ों तक चलता रहा।
फिर कहीं ऊपर से मंदिर की घंटियों की बहुत हल्की आवाज़ सुनाई दी।
मैं ठिठक गया।
पता नहीं वह सच में घंटी थी या मेरा भ्रम। लेकिन उसके बाद कदमों में फिर कुछ जान आ गई।
अब ऐसा लगने लगा था कि मंदिर पास है।
और फिर एक मोड़ के बाद वह दिखाई दिया।
पहाड़ की ऊँचाई पर खड़ा कार्तिक स्वामी मंदिर।
उस क्षण मैंने कोई बड़ी धार्मिक अनुभूति महसूस नहीं की। सच कहूँ तो सबसे पहली भावना राहत की थी—
“आखिर पहुँच गया।”
मैं कुछ देर वहीं खड़ा साँस लेता रहा।
लेकिन जैसे-जैसे साँस सामान्य हुई, आसपास की चीजें दिखाई देने लगीं।
हवा तेज थी। आकाश खुला हुआ था। दूर हिमालय की चोटियाँ दिखाई दे रही थीं। नीचे पहाड़ इतने छोटे लग रहे थे जैसे किसी बच्चे ने मिट्टी के ढेर बनाकर एक के पीछे एक रख दिए हों।
और बीच में वह मंदिर।
न कोई शहर का शोर, न हॉर्न, न दुकानों की भीड़।
घंटी बजती तो उसकी आवाज़ हवा में दूर तक चली जाती।
मैं मंदिर के पास बैठ गया।
कुछ देर कुछ करने का मन ही नहीं हुआ।
न फोटो खींचने का, न फोन देखने का।
बस बैठा रहा।
शायद हम यात्राओं में यही क्षण खोजते हैं और हमें इसका पता भी नहीं होता।
हम कहते हैं कि हमें मंदिर देखना है, पहाड़ देखना है, सूर्योदय देखना है। लेकिन वास्तव में शायद हम कुछ देर अपने भीतर की आवाज़ सुनना चाहते हैं, जो शहर के शोर में सुनाई नहीं देती।
मैं वहाँ किसी मन्नत के लिए नहीं आया था।
मैं घूमने आया था।
नई जगह देखने आया था।
लेकिन उस पहाड़ी पर बैठकर मुझे लगा कि किसी जगह का धार्मिक होना केवल उसकी मूर्ति या उसकी कथा में नहीं होता। कभी-कभी वहाँ तक पहुँचने में जो श्रम लगता है, वही आदमी को थोड़ा शांत कर देता है।
नीचे कार तक लौटना अभी बाकी था।
मैंने एक बार फिर दूर की चोटियों को देखा और उठ खड़ा हुआ।
वापसी की चढ़ाई अब उतराई बन गई थी, लेकिन घुटनों ने जल्दी ही बता दिया कि पहाड़ में उतरना भी कोई छोटी बात नहीं।
नीचे पहुँचकर जब अपनी कार दिखाई दी तो वह किसी पुराने साथी जैसी लगी।
दरवाज़ा खोला, सीट पर बैठा और कुछ क्षण वैसे ही बैठा रहा।
चाबी हाथ में थी, लेकिन इंजन चालू करने की जल्दी नहीं हुई।
सुबह जब इसी कार से निकला था, तब कार्तिक स्वामी केवल एक जगह थी जहाँ मुझे पहुँचना था।
अब लौटते समय वह केवल मंदिर नहीं था।
उसमें घुमावदार सड़कें थीं।
सड़क किनारे के छोटे गाँव थे।
बीच रास्ते में रोकी गई कार थी।
वह बुजुर्ग आदमी था जो धीरे चलते हुए मुझसे आगे निकल गया था।
वह “बस थोड़ा-सा” था जो खत्म ही नहीं हो रहा था।
वह पहली घंटी थी जो हवा में कहीं सुनाई दी थी।
और वह कुछ मिनट की खामोशी थी जब मैं मंदिर के पास बैठा केवल पहाड़ों को देख रहा था।
मैंने इंजन चालू किया।
कार धीरे-धीरे नीचे उतरने लगी।
रास्ते वही थे जिनसे सुबह आया था, पर अब हर मोड़ थोड़ा परिचित लग रहा था।
शायद यात्रा का अर्थ यही है।
आप जिस रास्ते से जाते हैं, लौटते समय वह रास्ता वही रहता है—
लेकिन लौटने वाला आदमी थोड़ा बदल चुका होता है।
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